बीते दिनों की याद खूब आती है,
वो यादे ही आसू ला देती है,
याद उस पल की जब विधालय जाया करते थे,
उठाने के समय, हम में रोया करते थे ,
घर पर सब हमरी एक आदत से परेशान थे
स्कूल न जाने में, हम माहन थे
अध्यापिका हमसे परेशान थी
वोह भी सच में महान थी
स्कूल की घंटी से हम,बड़ा प्रेम करते थे
उसके बजने का इन्जार बेसाब्री से किया करते थे
कभी तो खुद ही बजा दिया करते थे..
अब न जाने क्यू, वो पल बाड़े याद आते है
सोच कर उन्हें आसू आ जाते है
अब उठने के लिए रोते नहीं है
घर पर अब, कोई कुछ कहेता भी नहीं है
सभी से मिलने को बेकरार है
उस मोर्निंग प्रयेर की घंटी, आज भी इंतज़ार है
दोस्त हमे रोज मिला करते थे,
२ रुपिये की कलम के लिए लड़ाई किया करते थे
बाड़े फाटक के सामने इमली वाली, बेर-इमली बेचा करती थी,
२ रुपये की कीमत, उस समय तो काफी लागा करती थी
वो संतरे की आइसक्रीम वाला, गंदे पानी की आइसक्रीम बेचा करता था,
उसका स्वाद क्या गजब लागता था
आज दोस्तों से मिलने के लिए, दूरभाष पर अपॉइंटमेंट लिया जाता है,
सभाओ का आयोजन किया जाता है.
२०० रुपये की कलम, को तोफे में दी जाती है,
इमली वाली बाई, आजकल शायद वह नहीं जाती है.
मोकिना की आइसक्रीम अब वह बिका करती है,
उसके स्वाद की बात, वो तो नहीं लागती है .
विधालय, साथियों और शिक्षको की याद आज खूब आती है
वो पल को फिर से कभी न जीने की कमी सताती है
शायद यह कभी मौका न मिला हो उन्हें धन्यवाद् करने का
सभी से गले मिलकर उनके सांग घूमने का.. :(
वो यादे ही आसू ला देती है,
याद उस पल की जब विधालय जाया करते थे,
उठाने के समय, हम में रोया करते थे ,
घर पर सब हमरी एक आदत से परेशान थे
स्कूल न जाने में, हम माहन थे
अध्यापिका हमसे परेशान थी
वोह भी सच में महान थी
स्कूल की घंटी से हम,बड़ा प्रेम करते थे
उसके बजने का इन्जार बेसाब्री से किया करते थे
कभी तो खुद ही बजा दिया करते थे..
अब न जाने क्यू, वो पल बाड़े याद आते है
सोच कर उन्हें आसू आ जाते है
अब उठने के लिए रोते नहीं है
घर पर अब, कोई कुछ कहेता भी नहीं है
सभी से मिलने को बेकरार है
उस मोर्निंग प्रयेर की घंटी, आज भी इंतज़ार है
दोस्त हमे रोज मिला करते थे,
२ रुपिये की कलम के लिए लड़ाई किया करते थे
बाड़े फाटक के सामने इमली वाली, बेर-इमली बेचा करती थी,
२ रुपये की कीमत, उस समय तो काफी लागा करती थी
वो संतरे की आइसक्रीम वाला, गंदे पानी की आइसक्रीम बेचा करता था,
उसका स्वाद क्या गजब लागता था
आज दोस्तों से मिलने के लिए, दूरभाष पर अपॉइंटमेंट लिया जाता है,
सभाओ का आयोजन किया जाता है.
२०० रुपये की कलम, को तोफे में दी जाती है,
इमली वाली बाई, आजकल शायद वह नहीं जाती है.
मोकिना की आइसक्रीम अब वह बिका करती है,
उसके स्वाद की बात, वो तो नहीं लागती है .
विधालय, साथियों और शिक्षको की याद आज खूब आती है
वो पल को फिर से कभी न जीने की कमी सताती है
शायद यह कभी मौका न मिला हो उन्हें धन्यवाद् करने का
सभी से गले मिलकर उनके सांग घूमने का.. :(
3 comments:
बहुत खूब कुश .....दिल को छु गई तेरी कविता और सच ऐसे ही दिन थे स्कूल के....missing my school days a lot....
बहुत खूब कुश .....दिल को छु गई तेरी कविता और सच ऐसे ही दिन थे स्कूल के....missing my school days a lot....
nice yar kush... why u wanna become a profession.. u have a great craeer in ur lik filed
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